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Saturday, 23 November 2013



तेरे हिस्से का वही खाली वक़्त ,जिस पर तेरी यादों का पहरा होता है , 
तेरी बच्चों सी वो बाते याद आती है,और तेरा हँसता हुआ चेहरा होता है ,

Saturday, 9 November 2013



अबद मुश्किले ,अदम सदाए ,इक कातिबे-कल्ब की कहानी मेरी
बेतलब बेसबब मुस्‍कुराती हुई,फकत देख रही है जिंदगानी मेरी


#अदम=अस्तित्वहीन,कल्ब =दिल ,कातिब =लेखक ,

Wednesday, 2 October 2013



कोई ज़मीन पर राज करता है ,किसी के ख्वाबों में फलक होते हैं
नज़रिए जुदा जुदा से हैं ,सबके जीने के पैमाने अलग होते हैं

Tuesday, 1 October 2013

ब्रेड का एक टुकड़ा




मै उठ आया हूँ  उस कैंटीन से ,
और छोड़ आया हूँ  वहाँ  प्लेट पर रखा ब्रेड का एक टुकड़ा ,
जिसे मंगाया था मैंने बड़े शौक से ,जिसे खाना चाहता था
मेरी चाहत जससे मै अपनी जरुरत मिटाना चाहता था
मैंने छोड़ दिया उसे , मेरी चाहत से वो थोडा कमतर था ,
पर भूख मिटाने  को बना था वो  ,मिटा देता तो बेहतर था,

मै उठ आया हूँ  उस कैंटीन से ,
और छोड़ आया हूँ  वहाँ  प्लेट पर रखा ब्रेड का एक टुकड़ा ,
पर उस आधे ब्रेड का ख्याल अब तक हलक पर अटका हुआ है
उसे छोड़ देना क्या सही था ,दिल इसी बात पर भटका हुआ है
वो काम आ सकता था किसी और के,मै कोशिश कर लेता तो अच्छा था
एक भूख तो मिटा  सकता था वो ,कूड़ेदानो  में तो जाने से अच्छा था

मै उठ आया हूँ  उस कैंटीन से ,
और छोड़ आया हूँ  वहाँ  प्लेट पर रखा ब्रेड का एक टुकड़ा ,
वो टुकड़ा देखकर के मुझको ,अब मुझसे  फरियाद कर दिया
 की मै  चाहत तो ना  था तेरा ,क्यों मुझे  बर्बाद कर दिया
तृप्त करके एक उदर को ,मै किसी के काम आना चाहता था,
प्लेट पर ही गल बसू ,ना ये कुठित अंजाम पाना  चाहता था

रात हो गई ,जागता  मै ,सोचता  हूँ  उसका दुखड़ा
मै उठ आया हूँ  उस कैंटीन से ,
और छोड़ आया हूँ  वहाँ  प्लेट पर रखा ब्रेड का एक टुकड़ा ,

(They seem LIFELESS but they have LIFE ,they say something,if u can hear it.)
#chedis

Monday, 30 September 2013

चलो ना कुछ देर और बात करते हैं



हर शब मन मे एक अरमां सा जगता है
रोज़ मिलकर भी कुछ अधुरा सा लगता है 
रोज़ ही बातो में कई दफ़ा लड़ते हैं
चलो ना कुछ देर और बात करते हैं

साथ ही चलते है ,साथ ही फिरते हैं
साथ गिरकर भी हर बार संभलते हैं
रोज़ ही किसी  नये ख्वाब में पलते हैं
चलो न कुछ देर और बात करते हैं  

कहते हैं बातों को ,बातों में हँसते है  
खामोश रहकर  भी सब कह लेते हैं
रोज़ ही ये किस्से कहाँ से निकलते हैं
चलो ना कुछ देर और बात करते हैं

मिलना जो होता है ,तो दूर भी रहते है
जाते हुए भी देखो ना  कितना लड़ते हैं
मन नहीं होता  फिर भी बिछड़ते हैं
चलो ना कुछ देर और बात करते हैं





Thursday, 29 August 2013



फिर एक हसीन शाम आकर इन खिड़कियो से झाँके  ,
ये बारिश ,ये बुँदे ,और वो भीगी सी  आंखे


"ख़ामोशी किसी भी चेहरे पर लिखी सबसे अच्छी कविता होती है ,अगर आपमें उसे पढ़ पाने का हुनर हो तो "

Friday, 23 August 2013



मकड़ी के जालों की तरह , उलझी हुई है ज़िन्दगी ,
जो सुलझाने लगूंगा तो ,टूट के बिखर जाएगी ,

Saturday, 3 August 2013



ज़िन्दगी के समुंदर को तैर के पार करो ,
वरना बह के तो पत्ता भी पार हो जाता है ,

#‎Happyfriendshipday‬

Thursday, 1 August 2013

तब मेरा होना दुनिया में ,मुझको अच्छा लगता है




जब थकी थकी सी बातों  में ,एक दर्द ज़रा सा रहता है
माँ दिनभर काम भी करती है ,और थकन रगों में बहता है
जब थके पांव की आहत को ,मै राहत कुछ पहुचाता हूँ 
माँ गुस्सा जब हो जाती है ,मै भी थोडा सकुचाता  हूँ 

जब मुझे देखकर माँ का चेहरा मुस्कानों से सजता है
तब मेरा होना दुनिया में मुझको अच्छा लगता है

जब बाबा काम  से आते है ,माँ पर थोडा झुंझलाते है
घर की चिंता जब करते है ,गुस्सा थोडा कर जाते है
जब मुझसे कहते है बेटा ,अब तू ही एक सहारा है
अब काम नही होगा मुझसे ,अब फ़र्ज़ ये तेरा सारा है

जब मुझसे उनकी उम्मीदों का सपना फिर से जगता  है
तब मेरा होना दुनिया में मुझको अच्छा लगता है

जब बहना मुझसे कहती है की ,मुझको  घुमने जाना है
भाई मेरा कह जाता है जब ,मुझको उसे पढ़ाना है
जब यार मेरे संग रहते है ,सब मिल कर मस्ती करते है
कुछ भी अनहोनी हो जाये ,सब एक साथ ही सहते  है

जब मेरी खातिर इन रिश्तों में ,रंग प्यार का रचता है
तब मेरा होना दुनिया में मुझको अच्छा लगता है

जब एक पागल लड़की मुझसे ,छुप छुप मिलने को आती है
डरती भी है ,लडती भी है ,मुझसे यूहि रूठ जाती है
जब उसे मनाने लगता हूँ ,जब नखरे बहुत दिखाती है
फिर प्यारी बाते करती है ,और आखिर मान ही जाती है

जब उसकी आँखों से सब हटकर , मेरा चेहरा बचता है
तब मेरा होना दुनिया में ,मुझको अच्छा लगता है 

It's blogger's birthday poem........









Wednesday, 31 July 2013



"Silence is the best poetry written on any face ,  if u r a good reader"

Friday, 19 July 2013

फिर एक शाम ढलने को है





अक्सर ये लगता है मुझको , दूर कही छुट आया है
पर मेरी आँखों में अपना वो , अक्स बना जो  पाया है
जो हरपल  आस दिलाता है की फिर से वापस आयेगा
जो वक़्त है उसकी यादों का ,उसको सच कर जायेगा ,

हर शब उठता मै आस लिए, कि अब तो वो मिलने को है
है  नाम लबों पर फिर से वो ही ,फिर एक शाम ढलने को है

वक़्त मेरा अब भी उतना ही ,उसकी खातिर बचता है
पहले वो साथ में होता था ,अब यादों से ही कटता  है
कैसा है ,किस हाल में है वो ,कुछ भी तो है  खबर नहीं
एक दुआ लगाये रखी है ,जाने कब होगा असर सही

बागों में पौधे डाले है ,कोई फूल नया खिलने को है
है  नाम लबों पर फिर से वो ही ,फिर एक शाम ढलने को है

इन  शामों को ,अँधियारो  में ,अब कहाँ  चिरागे जलती  है
 ये नब्ज़ मेरे सीने  की अब बस ,इंतज़ार में चलती है
अब क्या जीना अब क्या कहना ,अब कहाँ रहा कुछ बाकि है
और शामों को जलने की खातिर ,दिल ही मेरा काफी है

अब कैसे मै  भुलूँ तुझको ,कितनी सांसे चलने को है
है  नाम लबों पर फिर से वो ही ,फिर एक शाम ढलने को है


.In reference of .........
उसे पा ना सके तो भी सारी ज़िंदगी उसे प्यार
करेंगे .....
ये ज़रूरी तो नही जो मिल ना सके उसे छोड़ दिया
जाए.....










Tuesday, 9 July 2013



You may have lost the time to become the best.....
but it's never late to be better....
and that's the beauty of time.......
so don't regret for the past.....
just smile and go on.......

Friday, 14 June 2013



तुझे लगता है की हम भूल गए है तुझको....

गमे -हबीब  ये है की ......

तेरे पास वक़्त कहाँ  है हमे याद आने के लिए ...

Friday, 19 April 2013

My little angel(बहना)





वो फूलों की खुशबू  के जैसे,
मन  मेरा महकती है ,
तंग करे, फिर खूब लड़े ,
दिल को मेरे बहलाती है ...

जब गम  की बदली छा  जाने से,
आँख मेरी भर आती है ,
वो खुशियों के सूरज से लड़कर,
धूप चुरा कर लाती है ...

वो नटखट है ,शैतान  भी है ,
होठों  पे मेरी मुस्कान भी है ,
जो सुनकर लोग है  तृप्त हुए,
उन गीतो का वो तान  भी है ...

वो चंचल है,होशियार भी है,
नफ़रत से परे एक प्यार भी है,
जो कथा कहानी क़िस्से  है,
वो उन सब का एक सार भी है,

 वो रौनक हे मेरे घर की,
मेरे घर का ही उजियला है,
घर भर मे सबकी प्यारी है,
वो ख़ुसीयो का एक प्याला है.....

जब कोई ग़लती करता हूँ ,
वो साथ मेरा ही देती है,
और पापा का गुस्सा न जाने,
खुद ही क्यों सह लेती है,

फिर साल के रक्षाबन्धन पर,
वो रखी मुझको बाँधती है,
खुश  रहती,कुछ ना कहती,
बस इतना ही वो मांगती है,

 की भाई तू मेरा प्यारा सा,
कुछ हो दुख बतला देना,
मै  बहना तेरी प्यारी सी,
जो रूठी तो मना  लेना,

माथे पे तिलक लगती है,
की भाई हरदम ख़ुश  रहना,
मुझे भूल ना जाना भूले से,
ये कहती है मेरी  बहना......
ये कहती है




"I know true love is heaven,but remember it comes only after the death"


"Sometimes you have to go alone in order to be with someone."

Saturday, 13 April 2013

कितना अच्छा होता है





 सच बचपन कितना अच्छा  होता है,नटखट लेकिन सच्चा होता है
अच्छा लगता है माँ के आंचल में सोना
वो बात बात पर हँसना  रोना
खिलौनों की उस दुनिया में खोना
दिल नादान  और दिमाग कच्चा होता है
सच बचपन कितना अच्छा होता है,  नटखट लेकिन सच्चा होता है 

अच्छा लगता है बहना की चोटी खीचकर सताना
बाद में फिर उसे टॉफी देकर मनाना
रात को फ्रिज की आइसक्रीम चट कर जाना
फिर सुबह खुद को निर्दोष बताना
मौज मस्ती भरपूर रचा होता है
सच बचपन कितना अच्छा होता  है,  नटखट लेकिन सच्चा होता है

अच्छा लगता है किसी जिद पर अड़ जाना
किसी और के झगड़े में खुद पड़ जाना
किसी और को सता कर किसी और को फसाना
उसे डांट खिलाकर खुद बच जाना
 मन का शैतानी वो नक्शा होता है
सच बचपन कितना अच्छा होता  है,  नटखट लेकिन सच्चा होता है

आज फिर वही बाल -दिवस आया है
चाचा नेहरु की यादें संग लाया है
बच्चे तो खुश होते ही है ,
बड़ो पर भी आज ख़ुशी का साया है
क्योंकि हर बड़ा भी कही एक बच्चा होता है 
सच बचपन कितना अच्छा होता  है,  नटखट लेकिन सच्चा होता है







--Wrote on the occasion of children's day when i was in class 9th.




वक़्त थामता क्यो नही.....



वक़्त थामता क्यो नही.....
ये हसीन सी राते,
अधूरी मुलाक़ते,
चाय के गर्म प्याले,
और खट्टी मीठी बाते,
इतना कुछ जीने मे,मन संभालता क्यो नही.
ये होना बड़ा अच्छा है,वक़्त थामता क्यो नही
वो 3 बजे सोना,
वो सपना एक सलोना ,
फिर देर से उठना,
और क्लास के लिए रोना
रोज़ का किस्सा है,कुछ बदलता क्यो नही..
ये होना बड़ा अच्छा है वक़्त थामता क्यो नही..
एग्ज़ॅम्स का आना,
थोड़ा सा डर जाना,
थोड़ा पढ़ना,फिर उब  जाना
कॉफ़ी पीने के लिए नींद का बहाना,
फिर भी मन पढने का ,कुछ बनता क्यो नही..
ये होना बड़ा अच्छा है वक़्त थामता क्यो नही......



Saturday, 6 April 2013



खुली जुल्फ़ें,नाज़ुक अदाए,होठों पर अपनी हँसीं लिए फिरती है
कुछ इस तरह मेरी ज़िन्दगी मुझसे रोज़ मिला करती है

चंद लम्हों में सिमटी हुई है



ज़िन्दगी की कितनी हसीं यादें ,
कुछ चंद  लम्हों में सिमटी हुई है
कुछ यादों के लम्हे है
कुछ लम्हों के यादें है
अपने इश्क  से किये हुए
कुछ अनकहे वादें है 
 कुछ चाहतें  बढती ज़िन्दगी में बिखर जाते है
और टूटे हुए सपने  मेरे पावं  में चुभ जाते है
 ये ख्वाहिशे भी अब जरा सी  थमती हुई है
ज़िन्दगी की कितनी हसीं यादे ,
चंद लम्हों में सिमटी हुई है
 कुछ चाहते जो कभी  रिश्ते न बन पाए
कुछ रिश्ते जिनमे चाहते न बस पाई 
कुछ लोग जो जान कर भी अनजान रहे
कुछ  अंजानो ने अपनों की  अहमियत बतलाई
 इश्क  और रहमत की  धूप  निकलने से
 चेहरे की रंगत खिलती हुई है
 ज़िन्दगी की कितनी हसी यादें ,
 चंद लम्हों में में सिमटी  हुई है 






Wednesday, 27 March 2013

फ़ुर्सत के लम्हो मे










 फ़ुर्सत के लम्हो मे,कभी हो आता हूँ  उस वीरान से कमरे से,
जहाँ बिखरे हुए है,मेरे बचपन के कई साथी,
कुछ टूटे हुए खिलोने,जो लगता है  की मुझे बुला रहे है ,
वो गली अब चहकहना भूल गई है ,जहाँ  खेल खेल मे काँच टूटा करते थे,
जहा दीवारो पे अब भी.स्टंप के निशान बने हुए है ,
वो नदी पहाड़ के खेल मे हम जो बना आए थे,
वो नदी पहाड़ अब सुने पड़  गये हे,
वो हमारी  छुपने की जगह...अब सच मे छुप  गई है  दुनिया से,
उस मैदान मे अब भी वो खपरेल  शिद्दत  से फैले हुए है ,
जो आख़िरी खेल मे किसी ने गिरा दिए थे  पित्ठुल से,
अब गलिया तरस गई है बच्चों  के लिए...
जिनकी हसीं अक्सर वहाँ  पर गूंजा करती थी...

Tuesday, 26 February 2013

हताशा





यू ही तो नही आती है चाहे बेगैर,
कुछ तो खता मुझसे हो जाती है
ये हताशा इस कदर बस जाती है मुझमे,
मुझको मुझ से  कही दूर ले जाती है,

मै हारू तो मेरे हार मे नज़र आती है,
मुझसे रूठे हुए प्यार मे नज़र आती है,
कभी बनकर किसी के लबों की बद्दुआ,
ज़हन मे मेरे सहर कर जाती है,

ये हताशा इस कदर बस जाती है मुझमे
मुझको मुझ से कही दूर ले जाती है,

ये घर कर जाती है,टूटे हुए सपनो मे,
याद सी आती है छूटे हुए अपनो मे
अधूरी सी उम्मीदों मे,टूट कर बिखर जाती है
ज़िंदगी के राहों पर ,पावं मे चुभ जाती है,

ये हताशा इस कदर बस जाती है मुझमे,
मुझको मुझसे कही दूर ले जाती हे,

जो पत्थर मैने मारा है पानी मे,
वो मेरी हताशा का ही रूप है,
मेरे चेहरे पर जो बिखर आया है,
वो हताशा के सूरज का धूप है,

कई चालों से निकलती है मुझसे,
एक तलक तो कही पे ठहर जाती है,
ये हताशा इस कदर बस जाती है मुझमे,
मुझको मुझ से कही दूर ले जाती है













Tuesday, 19 February 2013



चलो उसी मोड़ से फिर शुरू करे ज़िंदगी,
जहाँ हर एक पल हसीन था हम तुम थे अजनबी

Sunday, 17 February 2013

हँसी बिखरानी थी...A inspired one..



 हँसी बिखरानी थी...A inspired one..


फूलों की दुकान पर एक फूल मुस्कुरा रहा था
बीमार बच्ची के लिए मै वो फूल ले जा रहा था

बड़ा ख़ुश था वो आज टूटकर अपनी साखों से
ख़ुशिया साफ झलक रही थी उसकी आँखो से,

वो मंद मंद मुस्काता ही जा रहा था,
अपनी ही धुन मे वो गाता ही जा रहा था,

आख़िर मैने पूछ ही लिया,क्यो इतने ख़ुश हो तुम,
वो कहने लगा धीरे से और होने लगा गुमशुम,

मुझे याद है  जब मै बीज हुआ करता था,
सड़क के किनारे मिट्टी मे दबा रहता था,

कोई कुचल मुझे देता,कोई कचरे फेक देता,
कभी गाड़ी का धुआ मेरी साँसे रोक देता,

ये सब झेल कर मै बड़ा हुआ,
एक पौधा बनकर खड़ा हुआ,

फिर सूरज ने जलाया,हवा ने उड़ाया,बारिश ने भी मुझको खूब  सताया,
पर लड़ता रहा मै सहता रहा मै,फूल बनकर मै निकल ही आया

ये सब झेलकर मै सोचता रहा,
किस्मत को अपनी मै कोसता रहा,

ऐसी जिंदगी का मतलब ही क्या है,
ये जीना नही हे,ये जीना सज़ा है,

फिर किसी ने तोड़ लिया मुझको,
कई और फुलो के साथ जोड़ दिया मुझको,

फिर कई राहों से होते हुए तेरे पास आया.
इस बच्ची से जीने का मतलब समझ आया,

मेरी अब तक की ज़िंदगी की इतनी सी कहानी थी
एक बच्ची के ओठों पे हँसी बिखरानी थी

आँसू बहते है प्यास मे



                                                     EVERY DROP COUNTS

जब कभी नल से व्यर्थ मे पानी बहता है,
कही दूर आँखो से आँसू बहते है प्यास मे,
निगाहो को रखे उपर की तरफ
बैठे रहते है दो बूँद की आस मे,

पानी को खिलोना समझकर हम उससे खेला करते है,
हमारे इस खेल की सज़ा वो बेचारे भरते है

सूखे होठ  और खाली बर्तन उनका दुख बया करते है,
उनके बुझे बुझे से चेहरे पानी की राह ताकते है

देख कर भी सब कुछ हम बने रहते अंजान है,
क्यो नही सोचते उनके बारे मे,आख़िर वो भी तो इंसान है

आदमी से ज्यादा तो कुत्ता वफ़ादारी रखता है
वो बचा लेता पानी पर वो नल बंद नही कर सकता है

ऐसे मे इंसान इंसानो से ही आस लगाए है,
की समझ जाए वो पानी बिन सब तंग है,
जीवन की शुरुआत पानी से है और जल ही जीवन है

कही ऐसा ना हो की समझने मे ही देर हो जाए
समय छूट जाए हाथो से और पानी ही ख़त्म हो जाए

तो आओ मिलकर प्राण ले की हरदम आस जगाएँगे
बचा ना सके पानी तो क्या,व्यर्थ मे पानी नही गावाएँगे

Wednesday, 13 February 2013

फिर जगने मे रखा क्या है






कुछ दिन  पहले की बाते है , मुझे तू ही अच्छा लगता था
तुझे देख की ही मै खुश होता,और सारी रात को जागता था

तुझे छुप छुप क्लास की खिड़की से,मै कैसे झाँका करता था
कभी  दरवाज़ो  के  चौखट पे , तेरी राहें  ताका  करता था

कभी  मेस  मे  बैठे - बैठे जब भी, तू  मुझको दिख जाती थी
तब बिन  खाए  ना  जाने  कैसे , भूख  मेरी  मिट  जाती थी

तुझे  छुप - छुप कर  देखा करता था,देख के ही रह जाता था
नाराज़  ना  हो  जाए मुझसे , इस बात से  बस मै डरता था

तू भी तो मुझको देख कभी, धीरे से शर्मा जाती थी
कभी देख मुझे तू गुस्से से,आगे को भागी जाती थी

अभी पाया भी तो ना तो तुझको,डरता था तुझे खो ना दू
तुझे  देख  के ही तो खुश होता हूँ , रूठे तो मे भी रो दूं

कुछ दिन पहले की बाते है.....

मेरे यार मुझे  ये कहते  थे , हरदम  समझते   रहते थे
ये  प्यार नही बस माया है ,तू अब तक फँसता आया है

तू दूर से देखता है उसको , और  देखता  ही रह जाएगा
ये उलझा उलझा प्यार तेरा,बस ख्वाब ही एक रह जाएगा

जो अक्सर याद मे आती थी ,और रातों मुझे जगाती थी
कुछ दिन पहले की बाते थी,कुछ दिन पहले की बाते थी

पर आज मेरा कुछ लाया है,वो खुद चलकर ही आया है
माना है उसने प्यार मेरा , और मुझको भी अपनाया है

ये सब मुझको बस ख्वाब है लगता,ना जाने की सच क्या है
गर ख्वाब मे मुझको मिला है वो, तो जगने मे रखा क्या है 
फिर जगने मे रखा क्या है.

Tuesday, 12 February 2013

सोच लिया करता हूँ....



              

जब वक़्त मिलता है, सोच लिया करता हूँ,
तेरी यादों को अतीत से नोच लिया करता हूँ,

कुछ पल के लिए ही सही एक बहाने से
ये बहते हुए आँसू पोछ लिया करता हूँ

गम का होना तो अब ज़हन मे शामिल है
पर फ़ितरत की खातिर मै खुश रहा करता हूँ

कुछ रस्मे ज़माने की रास नही आती,
एक आस लगाए मै सब सहा करता हूँ,

मोती की कीमत का मुझे अंदाज़ा नही है,
उन आँखो के पानी को बचाए रखता हूँ,

मेरी ज़िंदगी की कहानी मेरे हौसलो से है,
मै आँधी मे दीया जलाए रखता हूँ,

ना जाने किस दर पे कोई जश्न आ जाए,
हर शाम इसलिए घर सजाए रखता हूँ

Monday, 11 February 2013

LIFE IN A NAVODAYA



                                                     
                                                      LIFE IN A NAVODAYA 



तुझे याद न होगा नवोदय मे जब पहली बार तू आया था,
मासूम सा चेरहा था तेरा और साथ मे बक्शा लाया था,

डरता था तोड़ा तू मुझसे और मै भी तो घबराया था,
पर हिम्मत करके एक दफ़ा तुझको ही दोस्त बनाया था,

तुझे याद न होगा सुबह को जब ज़ोर से सिटी बजती थी,
आँखो मे आँसू लाती थी और कितनी गंदी लगती थी,

फिर दौड़ के जैसे तैसे भी मैदान को देर से आते थे,
सुबह सुबह नर्मी हाथो मे मोटे डंडे खाते थे,

फिर बैठ वहाँ पर साथ मे सबके चाय की गर्मी पाते थे,
और हाउस मे जा के चुपके से हम गद्‍दे पर सो जाते थे,

तुझे याद न होगा इडली से हम कैसे नज़र चुराते थे,
नवोदय गान को सुनकर फिर जल्दी से हॉल को आते थे,

आए न आए कुछ हमको पर सबको बहुत सिखाते थे,
फिर क्लास की खिड़की पर जाकर हम उसपे नज़र टिकते थे,

तुझे याद न होगा 4 बजे हम सोते ही रह जाते थे,
फिर आँख मसल के उठते थे और खेलने को आ जाते थे,

शाम को प्रेयर करके हम फिर क्लास को जल्दी आते थे,
फिर 8 बजे तक सच मे हम कुछ अच्छे से पढ़ पाते थे,

मै चुपके से थाली मे तेरे सब्जी डाला करता था,
तू एक झलक पाने को उसकी मेस से झाँका करता था,

तुझे याद न होगा बातों मे हम जब भी झगड़ा करते थे,
तेरीवाली मेरीवाली ये कहकर चुटकी भरते थे,

ऐसे ही दिन कट जाता था हम हरदम ही खुश रहते थे,
कुछ दुख भी थे कुछ यादे थी सब हँसते हँसते सहते थे,

तुझे याद न होगा पिंज़रा था वो सालों जिसमे क़ैद रहे,
आज़ाद हुए तब तक तो हम पिंज़ारे से मोहब्बत कर बैठे.......


  

MY BOOK'S COMPLAIN TO ME.....

                     







 वो फिर मुझसे नाराज़ है..........
 



वो कहती है की भूल गये हो,इतने भी क्या दूर गये हो,

देख ज़रा मै  पास हू तेरे,आँख से आँख मिला तू मेरे,


हरदम तो तू फोन के संग है,खेला करता वादों से,

हरदम रहता यारों के संग,उलझा है किसकी यादों से,


तू सब करता पूरे मन  से,पर मुझको याद नही करता,

जाने की नफ़रत करता है,या फिर तू है  मुझसे डरता,


मै रूठी हूँ  नाराज़ हूँ तुझसे,कब आएगा मिलने मुझसे,

धूल जमी उस कोने पे, मै पड़ी पड़ी बेताब हूँ कब से,


कोई तो आँखे चार करे,मुझसे भी कोई प्यार करे,

तन्हा तन्हा मै जीती हू,कुछ बात कोई एक बार करे,


वो इतनी सीकवा क्यो करती है,अनचाहा सा राज है,

अभी दूर परीक्षा काफ़ी है,पुस्तक मुझसे नाराज़ है,


कैसे मै समझा दूं उसको,की उससे डर क्यो लगता है,

जब भी पढ़ने बैठू उसको,बस सिर मे दर्द सा उठता है,


जब भी गहराई मे उसकी ,थोड़ी दूर भी जाता हूँ,

उब जाता हूँ मै उससे भी,और खुद से भी उब जाता हूँ,


कैसे मै तुझसे प्यार करू,कैसे मै आँखे चार करू,

तू मोटी भी तो इतनी है,तुझे याद मै कितनी बार करू,


पर सच कहता हूँ पास मेरे,जब कोई इम्तेहाँ  रहता है,

संग उसके मुझको एक रात का,रिश्ता अच्छा लगता है,


फिर जगता  हूँ मै रातो को,और उसको ही बस पढ़ता हूँ,

थोड़ा  वो खुश हो जाती है,की प्यार उसे भी करता हूँ,


फिर सुबह परीक्षा ख़त्म हुई,मेरी ख़ुशियो का आगाज़ है,

टेबल पर रखी  वो पुस्तक,अब फिर मुझसे नाराज़ है,

अब फिर मुझसे नाराज़ है............

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