रोज़ मिलकर भी कुछ अधुरा सा लगता है
रोज़ ही बातो में कई दफ़ा लड़ते हैं
चलो ना कुछ देर और बात करते हैं
साथ ही चलते है ,साथ ही फिरते हैं
साथ गिरकर भी हर बार संभलते हैं
रोज़ ही किसी नये ख्वाब में पलते हैं
चलो न कुछ देर और बात करते हैं
कहते हैं बातों को ,बातों में हँसते है
खामोश रहकर भी सब कह लेते हैं
रोज़ ही ये किस्से कहाँ से निकलते हैं
चलो ना कुछ देर और बात करते हैं
मिलना जो होता है ,तो दूर भी रहते है
जाते हुए भी देखो ना कितना लड़ते हैं
मन नहीं होता फिर भी बिछड़ते हैं
चलो ना कुछ देर और बात करते हैं

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