LIFE IN A NAVODAYA
तुझे याद न होगा नवोदय मे जब पहली बार तू आया था,
मासूम सा चेरहा था तेरा और साथ मे बक्शा लाया था,
डरता था तोड़ा तू मुझसे और मै भी तो घबराया था,
पर हिम्मत करके एक दफ़ा तुझको ही दोस्त बनाया था,
तुझे याद न होगा सुबह को जब ज़ोर से सिटी बजती थी,
आँखो मे आँसू लाती थी और कितनी गंदी लगती थी,
फिर दौड़ के जैसे तैसे भी मैदान को देर से आते थे,
सुबह सुबह नर्मी हाथो मे मोटे डंडे खाते थे,
फिर बैठ वहाँ पर साथ मे सबके चाय की गर्मी पाते थे,
और हाउस मे जा के चुपके से हम गद्दे पर सो जाते थे,
तुझे याद न होगा इडली से हम कैसे नज़र चुराते थे,
नवोदय गान को सुनकर फिर जल्दी से हॉल को आते थे,
आए न आए कुछ हमको पर सबको बहुत सिखाते थे,
फिर क्लास की खिड़की पर जाकर हम उसपे नज़र टिकते थे,
तुझे याद न होगा 4 बजे हम सोते ही रह जाते थे,
फिर आँख मसल के उठते थे और खेलने को आ जाते थे,
शाम को प्रेयर करके हम फिर क्लास को जल्दी आते थे,
फिर 8 बजे तक सच मे हम कुछ अच्छे से पढ़ पाते थे,
मै चुपके से थाली मे तेरे सब्जी डाला करता था,
तू एक झलक पाने को उसकी मेस से झाँका करता था,
तुझे याद न होगा बातों मे हम जब भी झगड़ा करते थे,
तेरीवाली मेरीवाली ये कहकर चुटकी भरते थे,
ऐसे ही दिन कट जाता था हम हरदम ही खुश रहते थे,
कुछ दुख भी थे कुछ यादे थी सब हँसते हँसते सहते थे,
तुझे याद न होगा पिंज़रा था वो सालों जिसमे क़ैद रहे,
आज़ाद हुए तब तक तो हम पिंज़ारे से मोहब्बत कर बैठे.......

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