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Friday, 19 July 2013

फिर एक शाम ढलने को है





अक्सर ये लगता है मुझको , दूर कही छुट आया है
पर मेरी आँखों में अपना वो , अक्स बना जो  पाया है
जो हरपल  आस दिलाता है की फिर से वापस आयेगा
जो वक़्त है उसकी यादों का ,उसको सच कर जायेगा ,

हर शब उठता मै आस लिए, कि अब तो वो मिलने को है
है  नाम लबों पर फिर से वो ही ,फिर एक शाम ढलने को है

वक़्त मेरा अब भी उतना ही ,उसकी खातिर बचता है
पहले वो साथ में होता था ,अब यादों से ही कटता  है
कैसा है ,किस हाल में है वो ,कुछ भी तो है  खबर नहीं
एक दुआ लगाये रखी है ,जाने कब होगा असर सही

बागों में पौधे डाले है ,कोई फूल नया खिलने को है
है  नाम लबों पर फिर से वो ही ,फिर एक शाम ढलने को है

इन  शामों को ,अँधियारो  में ,अब कहाँ  चिरागे जलती  है
 ये नब्ज़ मेरे सीने  की अब बस ,इंतज़ार में चलती है
अब क्या जीना अब क्या कहना ,अब कहाँ रहा कुछ बाकि है
और शामों को जलने की खातिर ,दिल ही मेरा काफी है

अब कैसे मै  भुलूँ तुझको ,कितनी सांसे चलने को है
है  नाम लबों पर फिर से वो ही ,फिर एक शाम ढलने को है


.In reference of .........
उसे पा ना सके तो भी सारी ज़िंदगी उसे प्यार
करेंगे .....
ये ज़रूरी तो नही जो मिल ना सके उसे छोड़ दिया
जाए.....










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