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Monday, 11 February 2013



  

MY BOOK'S COMPLAIN TO ME.....

                     







 वो फिर मुझसे नाराज़ है..........
 



वो कहती है की भूल गये हो,इतने भी क्या दूर गये हो,

देख ज़रा मै  पास हू तेरे,आँख से आँख मिला तू मेरे,


हरदम तो तू फोन के संग है,खेला करता वादों से,

हरदम रहता यारों के संग,उलझा है किसकी यादों से,


तू सब करता पूरे मन  से,पर मुझको याद नही करता,

जाने की नफ़रत करता है,या फिर तू है  मुझसे डरता,


मै रूठी हूँ  नाराज़ हूँ तुझसे,कब आएगा मिलने मुझसे,

धूल जमी उस कोने पे, मै पड़ी पड़ी बेताब हूँ कब से,


कोई तो आँखे चार करे,मुझसे भी कोई प्यार करे,

तन्हा तन्हा मै जीती हू,कुछ बात कोई एक बार करे,


वो इतनी सीकवा क्यो करती है,अनचाहा सा राज है,

अभी दूर परीक्षा काफ़ी है,पुस्तक मुझसे नाराज़ है,


कैसे मै समझा दूं उसको,की उससे डर क्यो लगता है,

जब भी पढ़ने बैठू उसको,बस सिर मे दर्द सा उठता है,


जब भी गहराई मे उसकी ,थोड़ी दूर भी जाता हूँ,

उब जाता हूँ मै उससे भी,और खुद से भी उब जाता हूँ,


कैसे मै तुझसे प्यार करू,कैसे मै आँखे चार करू,

तू मोटी भी तो इतनी है,तुझे याद मै कितनी बार करू,


पर सच कहता हूँ पास मेरे,जब कोई इम्तेहाँ  रहता है,

संग उसके मुझको एक रात का,रिश्ता अच्छा लगता है,


फिर जगता  हूँ मै रातो को,और उसको ही बस पढ़ता हूँ,

थोड़ा  वो खुश हो जाती है,की प्यार उसे भी करता हूँ,


फिर सुबह परीक्षा ख़त्म हुई,मेरी ख़ुशियो का आगाज़ है,

टेबल पर रखी  वो पुस्तक,अब फिर मुझसे नाराज़ है,

अब फिर मुझसे नाराज़ है............

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