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Saturday, 6 April 2013

चंद लम्हों में सिमटी हुई है



ज़िन्दगी की कितनी हसीं यादें ,
कुछ चंद  लम्हों में सिमटी हुई है
कुछ यादों के लम्हे है
कुछ लम्हों के यादें है
अपने इश्क  से किये हुए
कुछ अनकहे वादें है 
 कुछ चाहतें  बढती ज़िन्दगी में बिखर जाते है
और टूटे हुए सपने  मेरे पावं  में चुभ जाते है
 ये ख्वाहिशे भी अब जरा सी  थमती हुई है
ज़िन्दगी की कितनी हसीं यादे ,
चंद लम्हों में सिमटी हुई है
 कुछ चाहते जो कभी  रिश्ते न बन पाए
कुछ रिश्ते जिनमे चाहते न बस पाई 
कुछ लोग जो जान कर भी अनजान रहे
कुछ  अंजानो ने अपनों की  अहमियत बतलाई
 इश्क  और रहमत की  धूप  निकलने से
 चेहरे की रंगत खिलती हुई है
 ज़िन्दगी की कितनी हसी यादें ,
 चंद लम्हों में में सिमटी  हुई है 






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