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Wednesday, 13 February 2013

फिर जगने मे रखा क्या है






कुछ दिन  पहले की बाते है , मुझे तू ही अच्छा लगता था
तुझे देख की ही मै खुश होता,और सारी रात को जागता था

तुझे छुप छुप क्लास की खिड़की से,मै कैसे झाँका करता था
कभी  दरवाज़ो  के  चौखट पे , तेरी राहें  ताका  करता था

कभी  मेस  मे  बैठे - बैठे जब भी, तू  मुझको दिख जाती थी
तब बिन  खाए  ना  जाने  कैसे , भूख  मेरी  मिट  जाती थी

तुझे  छुप - छुप कर  देखा करता था,देख के ही रह जाता था
नाराज़  ना  हो  जाए मुझसे , इस बात से  बस मै डरता था

तू भी तो मुझको देख कभी, धीरे से शर्मा जाती थी
कभी देख मुझे तू गुस्से से,आगे को भागी जाती थी

अभी पाया भी तो ना तो तुझको,डरता था तुझे खो ना दू
तुझे  देख  के ही तो खुश होता हूँ , रूठे तो मे भी रो दूं

कुछ दिन पहले की बाते है.....

मेरे यार मुझे  ये कहते  थे , हरदम  समझते   रहते थे
ये  प्यार नही बस माया है ,तू अब तक फँसता आया है

तू दूर से देखता है उसको , और  देखता  ही रह जाएगा
ये उलझा उलझा प्यार तेरा,बस ख्वाब ही एक रह जाएगा

जो अक्सर याद मे आती थी ,और रातों मुझे जगाती थी
कुछ दिन पहले की बाते थी,कुछ दिन पहले की बाते थी

पर आज मेरा कुछ लाया है,वो खुद चलकर ही आया है
माना है उसने प्यार मेरा , और मुझको भी अपनाया है

ये सब मुझको बस ख्वाब है लगता,ना जाने की सच क्या है
गर ख्वाब मे मुझको मिला है वो, तो जगने मे रखा क्या है 
फिर जगने मे रखा क्या है.

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