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Tuesday, 26 February 2013

हताशा





यू ही तो नही आती है चाहे बेगैर,
कुछ तो खता मुझसे हो जाती है
ये हताशा इस कदर बस जाती है मुझमे,
मुझको मुझ से  कही दूर ले जाती है,

मै हारू तो मेरे हार मे नज़र आती है,
मुझसे रूठे हुए प्यार मे नज़र आती है,
कभी बनकर किसी के लबों की बद्दुआ,
ज़हन मे मेरे सहर कर जाती है,

ये हताशा इस कदर बस जाती है मुझमे
मुझको मुझ से कही दूर ले जाती है,

ये घर कर जाती है,टूटे हुए सपनो मे,
याद सी आती है छूटे हुए अपनो मे
अधूरी सी उम्मीदों मे,टूट कर बिखर जाती है
ज़िंदगी के राहों पर ,पावं मे चुभ जाती है,

ये हताशा इस कदर बस जाती है मुझमे,
मुझको मुझसे कही दूर ले जाती हे,

जो पत्थर मैने मारा है पानी मे,
वो मेरी हताशा का ही रूप है,
मेरे चेहरे पर जो बिखर आया है,
वो हताशा के सूरज का धूप है,

कई चालों से निकलती है मुझसे,
एक तलक तो कही पे ठहर जाती है,
ये हताशा इस कदर बस जाती है मुझमे,
मुझको मुझ से कही दूर ले जाती है













Tuesday, 19 February 2013



चलो उसी मोड़ से फिर शुरू करे ज़िंदगी,
जहाँ हर एक पल हसीन था हम तुम थे अजनबी

Sunday, 17 February 2013

हँसी बिखरानी थी...A inspired one..



 हँसी बिखरानी थी...A inspired one..


फूलों की दुकान पर एक फूल मुस्कुरा रहा था
बीमार बच्ची के लिए मै वो फूल ले जा रहा था

बड़ा ख़ुश था वो आज टूटकर अपनी साखों से
ख़ुशिया साफ झलक रही थी उसकी आँखो से,

वो मंद मंद मुस्काता ही जा रहा था,
अपनी ही धुन मे वो गाता ही जा रहा था,

आख़िर मैने पूछ ही लिया,क्यो इतने ख़ुश हो तुम,
वो कहने लगा धीरे से और होने लगा गुमशुम,

मुझे याद है  जब मै बीज हुआ करता था,
सड़क के किनारे मिट्टी मे दबा रहता था,

कोई कुचल मुझे देता,कोई कचरे फेक देता,
कभी गाड़ी का धुआ मेरी साँसे रोक देता,

ये सब झेल कर मै बड़ा हुआ,
एक पौधा बनकर खड़ा हुआ,

फिर सूरज ने जलाया,हवा ने उड़ाया,बारिश ने भी मुझको खूब  सताया,
पर लड़ता रहा मै सहता रहा मै,फूल बनकर मै निकल ही आया

ये सब झेलकर मै सोचता रहा,
किस्मत को अपनी मै कोसता रहा,

ऐसी जिंदगी का मतलब ही क्या है,
ये जीना नही हे,ये जीना सज़ा है,

फिर किसी ने तोड़ लिया मुझको,
कई और फुलो के साथ जोड़ दिया मुझको,

फिर कई राहों से होते हुए तेरे पास आया.
इस बच्ची से जीने का मतलब समझ आया,

मेरी अब तक की ज़िंदगी की इतनी सी कहानी थी
एक बच्ची के ओठों पे हँसी बिखरानी थी

आँसू बहते है प्यास मे



                                                     EVERY DROP COUNTS

जब कभी नल से व्यर्थ मे पानी बहता है,
कही दूर आँखो से आँसू बहते है प्यास मे,
निगाहो को रखे उपर की तरफ
बैठे रहते है दो बूँद की आस मे,

पानी को खिलोना समझकर हम उससे खेला करते है,
हमारे इस खेल की सज़ा वो बेचारे भरते है

सूखे होठ  और खाली बर्तन उनका दुख बया करते है,
उनके बुझे बुझे से चेहरे पानी की राह ताकते है

देख कर भी सब कुछ हम बने रहते अंजान है,
क्यो नही सोचते उनके बारे मे,आख़िर वो भी तो इंसान है

आदमी से ज्यादा तो कुत्ता वफ़ादारी रखता है
वो बचा लेता पानी पर वो नल बंद नही कर सकता है

ऐसे मे इंसान इंसानो से ही आस लगाए है,
की समझ जाए वो पानी बिन सब तंग है,
जीवन की शुरुआत पानी से है और जल ही जीवन है

कही ऐसा ना हो की समझने मे ही देर हो जाए
समय छूट जाए हाथो से और पानी ही ख़त्म हो जाए

तो आओ मिलकर प्राण ले की हरदम आस जगाएँगे
बचा ना सके पानी तो क्या,व्यर्थ मे पानी नही गावाएँगे

Wednesday, 13 February 2013

फिर जगने मे रखा क्या है






कुछ दिन  पहले की बाते है , मुझे तू ही अच्छा लगता था
तुझे देख की ही मै खुश होता,और सारी रात को जागता था

तुझे छुप छुप क्लास की खिड़की से,मै कैसे झाँका करता था
कभी  दरवाज़ो  के  चौखट पे , तेरी राहें  ताका  करता था

कभी  मेस  मे  बैठे - बैठे जब भी, तू  मुझको दिख जाती थी
तब बिन  खाए  ना  जाने  कैसे , भूख  मेरी  मिट  जाती थी

तुझे  छुप - छुप कर  देखा करता था,देख के ही रह जाता था
नाराज़  ना  हो  जाए मुझसे , इस बात से  बस मै डरता था

तू भी तो मुझको देख कभी, धीरे से शर्मा जाती थी
कभी देख मुझे तू गुस्से से,आगे को भागी जाती थी

अभी पाया भी तो ना तो तुझको,डरता था तुझे खो ना दू
तुझे  देख  के ही तो खुश होता हूँ , रूठे तो मे भी रो दूं

कुछ दिन पहले की बाते है.....

मेरे यार मुझे  ये कहते  थे , हरदम  समझते   रहते थे
ये  प्यार नही बस माया है ,तू अब तक फँसता आया है

तू दूर से देखता है उसको , और  देखता  ही रह जाएगा
ये उलझा उलझा प्यार तेरा,बस ख्वाब ही एक रह जाएगा

जो अक्सर याद मे आती थी ,और रातों मुझे जगाती थी
कुछ दिन पहले की बाते थी,कुछ दिन पहले की बाते थी

पर आज मेरा कुछ लाया है,वो खुद चलकर ही आया है
माना है उसने प्यार मेरा , और मुझको भी अपनाया है

ये सब मुझको बस ख्वाब है लगता,ना जाने की सच क्या है
गर ख्वाब मे मुझको मिला है वो, तो जगने मे रखा क्या है 
फिर जगने मे रखा क्या है.

Tuesday, 12 February 2013

सोच लिया करता हूँ....



              

जब वक़्त मिलता है, सोच लिया करता हूँ,
तेरी यादों को अतीत से नोच लिया करता हूँ,

कुछ पल के लिए ही सही एक बहाने से
ये बहते हुए आँसू पोछ लिया करता हूँ

गम का होना तो अब ज़हन मे शामिल है
पर फ़ितरत की खातिर मै खुश रहा करता हूँ

कुछ रस्मे ज़माने की रास नही आती,
एक आस लगाए मै सब सहा करता हूँ,

मोती की कीमत का मुझे अंदाज़ा नही है,
उन आँखो के पानी को बचाए रखता हूँ,

मेरी ज़िंदगी की कहानी मेरे हौसलो से है,
मै आँधी मे दीया जलाए रखता हूँ,

ना जाने किस दर पे कोई जश्न आ जाए,
हर शाम इसलिए घर सजाए रखता हूँ

Monday, 11 February 2013

LIFE IN A NAVODAYA



                                                     
                                                      LIFE IN A NAVODAYA 



तुझे याद न होगा नवोदय मे जब पहली बार तू आया था,
मासूम सा चेरहा था तेरा और साथ मे बक्शा लाया था,

डरता था तोड़ा तू मुझसे और मै भी तो घबराया था,
पर हिम्मत करके एक दफ़ा तुझको ही दोस्त बनाया था,

तुझे याद न होगा सुबह को जब ज़ोर से सिटी बजती थी,
आँखो मे आँसू लाती थी और कितनी गंदी लगती थी,

फिर दौड़ के जैसे तैसे भी मैदान को देर से आते थे,
सुबह सुबह नर्मी हाथो मे मोटे डंडे खाते थे,

फिर बैठ वहाँ पर साथ मे सबके चाय की गर्मी पाते थे,
और हाउस मे जा के चुपके से हम गद्‍दे पर सो जाते थे,

तुझे याद न होगा इडली से हम कैसे नज़र चुराते थे,
नवोदय गान को सुनकर फिर जल्दी से हॉल को आते थे,

आए न आए कुछ हमको पर सबको बहुत सिखाते थे,
फिर क्लास की खिड़की पर जाकर हम उसपे नज़र टिकते थे,

तुझे याद न होगा 4 बजे हम सोते ही रह जाते थे,
फिर आँख मसल के उठते थे और खेलने को आ जाते थे,

शाम को प्रेयर करके हम फिर क्लास को जल्दी आते थे,
फिर 8 बजे तक सच मे हम कुछ अच्छे से पढ़ पाते थे,

मै चुपके से थाली मे तेरे सब्जी डाला करता था,
तू एक झलक पाने को उसकी मेस से झाँका करता था,

तुझे याद न होगा बातों मे हम जब भी झगड़ा करते थे,
तेरीवाली मेरीवाली ये कहकर चुटकी भरते थे,

ऐसे ही दिन कट जाता था हम हरदम ही खुश रहते थे,
कुछ दुख भी थे कुछ यादे थी सब हँसते हँसते सहते थे,

तुझे याद न होगा पिंज़रा था वो सालों जिसमे क़ैद रहे,
आज़ाद हुए तब तक तो हम पिंज़ारे से मोहब्बत कर बैठे.......


  

MY BOOK'S COMPLAIN TO ME.....

                     







 वो फिर मुझसे नाराज़ है..........
 



वो कहती है की भूल गये हो,इतने भी क्या दूर गये हो,

देख ज़रा मै  पास हू तेरे,आँख से आँख मिला तू मेरे,


हरदम तो तू फोन के संग है,खेला करता वादों से,

हरदम रहता यारों के संग,उलझा है किसकी यादों से,


तू सब करता पूरे मन  से,पर मुझको याद नही करता,

जाने की नफ़रत करता है,या फिर तू है  मुझसे डरता,


मै रूठी हूँ  नाराज़ हूँ तुझसे,कब आएगा मिलने मुझसे,

धूल जमी उस कोने पे, मै पड़ी पड़ी बेताब हूँ कब से,


कोई तो आँखे चार करे,मुझसे भी कोई प्यार करे,

तन्हा तन्हा मै जीती हू,कुछ बात कोई एक बार करे,


वो इतनी सीकवा क्यो करती है,अनचाहा सा राज है,

अभी दूर परीक्षा काफ़ी है,पुस्तक मुझसे नाराज़ है,


कैसे मै समझा दूं उसको,की उससे डर क्यो लगता है,

जब भी पढ़ने बैठू उसको,बस सिर मे दर्द सा उठता है,


जब भी गहराई मे उसकी ,थोड़ी दूर भी जाता हूँ,

उब जाता हूँ मै उससे भी,और खुद से भी उब जाता हूँ,


कैसे मै तुझसे प्यार करू,कैसे मै आँखे चार करू,

तू मोटी भी तो इतनी है,तुझे याद मै कितनी बार करू,


पर सच कहता हूँ पास मेरे,जब कोई इम्तेहाँ  रहता है,

संग उसके मुझको एक रात का,रिश्ता अच्छा लगता है,


फिर जगता  हूँ मै रातो को,और उसको ही बस पढ़ता हूँ,

थोड़ा  वो खुश हो जाती है,की प्यार उसे भी करता हूँ,


फिर सुबह परीक्षा ख़त्म हुई,मेरी ख़ुशियो का आगाज़ है,

टेबल पर रखी  वो पुस्तक,अब फिर मुझसे नाराज़ है,

अब फिर मुझसे नाराज़ है............

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