सुनाई देती है जल्दबाजी
रात भर अपनी आँखे बिछाये
चलती रहती है गाड़ियाँ
सुस्ताये होठो से निकलकर
रात भर उड़ता है धुआं
और सातवीं मंजिल पर कुछ आंखे
रात भर लड़ती हैं नीदं से
ये गुडगाँव है जनाब
शोहरत का शहर है
कुछ मुझ जैसा ही बिगड़ा हुआ है
ये शहर भी अक्सर रात भर जगा रहता है
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