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Saturday, 18 November 2017

जवानी और बेशर्मी





पार्क में बैठे हुए उन दोनों को
खूब डराया और सुनाया था  लोगो ने 
हाथ भी उठा दिए थे 
उस डरे हुए लड़के पर 
बता दिया था की 
ये सब नहीं चलता है यहाँ पर ,

मेट्रो के भीड़ में ,
उसे संभाले  हुए 
थोड़े करीब आकर 
भीड़ से बचाते हुए उसे, 
वो कर रहा था अपनी बातें, 
शर्म की दुहाई देकर 
किसी ने मशहूर कर दिया है 
उन्हें सोशल मीडिया पर

वो अपने दोस्तों के संग 
जता रही थी अपना होना 
उसकी हसीं खुशी बेफिक्र थी
और उसकी आवाज़ बेबाक 
यौवन कैसा होता है 
पता चलता था उसे सुनते देखते 
पर खुद को छुपा लेना बेहतर है 
उसे बता दिया था लोगो की नजरो ने 

और ठीक उसी समय 
कोई पानी बहा रहा है सबके  सामने 
खुली दीवारों पर 
छुप कर के कैद कर रहा है कैमरे में 
किसी की इज्ज़त 
और लड़की से शादी के लिए 
खुले मुह माँगा जा रहा है दहेज़ 
तब लोग नहीं सोचेंगे कुछ 
और ना ही कुछ कहा जायेगा  
 
पता नहीं ये देश 
कब समझेगा की  
जवानी और बेशर्मी में बहुत फर्क होता है   



 


  



 

Sunday, 2 July 2017

ख़ामोशी को सुनना




एक रोज़ कभी जब निलों पे
सूरज डूब रहा होगा
जब पंछी कोई घर को अपने
उड़ कर लौट रहा होगा
जब साख सभी पेड़ो के थक कर
सुस्ताकर के झूलेंगे
जब सांझ तले पर्वत के तट पर
झरने कुछ कुछ बोलेंगे
जब दिन भर की हलचल के आगे 
ख़ामोशी एक उभरेगी 
जब जलते दिन के आंचल में  
कुछ शामें आंखे खोलेंगी 
तब ठीक वहीँ पर बैठे तुम 
खुद को खोया सा पाओगे 
महसूस करोगे सांसो को 
धड़कन भी बुन पाओगे 
जब भूले शाम शहर की अपने 
खुद का होना पाओगे 
"तब फैली इस ख़ामोशी में तुम 
कितना कुछ सुन पाओगे"  

Saturday, 22 April 2017

कितनों के अच्छे से कहीं ज्यादा अच्छा है



बिछड़ जाना 
सबसे मिलकर भी 
भटक जाना 
रास्तों पे होकर भी 
सहम जाना 
सख्त होकर भी 
होश में 
लडखडाना और बहक जाना 
बुरा होता है कभी कभी 

कभी हार जाना 
लाख कोशिश के बाद भी,
छुट जाना खुद से 
ज़माने से आगे रहकर भी 
सब कुछ सह जाना 
और कुछ ना कहना भी
समेट कर खुदको  
टूट जाना और बिखर जाना  
बुरा होता है कभी कभी 

ये कभी कभी जो बुरा होता है 
और बहुत ही बुरा लगता है तुम्हे 
समझ सकता हूँ मैं,
ये दौर जो छीन लेता है तुमसे 
जीने की चाहत , मार देता है तुम्हे 
समझ सकता हूँ मैं 

पर तुम नहीं समझते की  
जब भी तुम जाते हो दुनिया छोड़कर 
तो कभी अकेले नहीं जाते 
छोड़ जाते हो कई रिश्तों की लाशें 
जो कभी दफनाई नही जा सकती 
तुम्हारी यादों के कारण,   
और तुम जब भी जाते हो
ले जाते हो संग अपने 
वो सारी हसीं ,खुशी और उम्मीदें
जो तुम्हारे होने से होती है   

इसलिए मैं ये समझता हूँ 
और चाहता हूँ की तुम भी समझो 
की ज़न्दगी बुरी होती ही है 
तुम्हे अच्छा बनाने के लिए 
तुम्हे परखने के लिए 
तुम्हे सजाने के लिए 
तो कुछ भी करने से पहले 
बस इतना जान लो 

"ये जो बहुत बुरा लगता है ना तुम्हे 
कितनों के अच्छे से कहीं ज्यादा अच्छा है | "

#STOP_SUICIDE

Friday, 17 March 2017

जब चली जाओगी तुम ऑफिस से



कैसा लगेगा जब तुम चली जाओगी
उस कोने से
जहाँ से तुम दिखाई भी नहीं देती
पर सुनाई देती हो ,
और जब भी कुछ कहती हो,
या लिखती हो तो
गूंज जाती हो ऑफिस के हर एक कोने तक
उसी कोने पर बैठे बैठे
जहाँ से तुम दिखाई भी नहीं देती

कैसा लगेगा जब चली जाओगी तुम
और नहीं रहोगी उस सफर में
जो सीढ़ियों से होकर के
ख़त्म होती है टपरी पे जाकर
और की जिसमे हसीं तुम्हारी
भर देती है चहक
सीढियो को संभाले दीवारों में

कैसा लगेगा जब तुम चली जाओगी
और फ़ोन आ जायेगा किसी का
फिर वो पूछेगा तुम्हारे बारे में
और खोजेगा तुम्हारी आवाज़
जो फ़ोन के सिरहाने आकर
बड़े प्यार से बेबी कहा करती है

तब अक्सर सोचता हूँ
की जब चली जाओगी तुम
तो शायद
कुछ शरारतें कम हो जाएंगी
किस्सों के सिलसिले रुक जायेंगे
कीबोर्ड की आवाज़ें थम जाएँगी
कुछ हसीं कुछ ठहाके कम होंगे
और नज़ाकत की कमी बन जायेगी

और कुछ यूँ होगा की होता है जैसे
जब चलें जातें है छोटे बच्चे घर से
बहुत देर तलक सुना सा रहता है आंगन
तुम चली जाओगी जब
तो कुछ देर तलक हम सबको ऐसा ही लगेगा शायद ||

Monday, 20 February 2017

किफ़ायती इश्क़

















एक पुरे हफ़्ते से
इतवार के कुछ लम्हे ,
पैरों की सवारी पर
खर्च होते चंद लफ्ज़,
मिलती हुई नज़रें
मुट्ठी भर की हसीं,
कुछ दाने मूंगफली के
और टपरी की चाय

तुमसे इश्क़ करना
कितना किफ़ायती है ॥






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