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Sunday, 2 July 2017

ख़ामोशी को सुनना




एक रोज़ कभी जब निलों पे
सूरज डूब रहा होगा
जब पंछी कोई घर को अपने
उड़ कर लौट रहा होगा
जब साख सभी पेड़ो के थक कर
सुस्ताकर के झूलेंगे
जब सांझ तले पर्वत के तट पर
झरने कुछ कुछ बोलेंगे
जब दिन भर की हलचल के आगे 
ख़ामोशी एक उभरेगी 
जब जलते दिन के आंचल में  
कुछ शामें आंखे खोलेंगी 
तब ठीक वहीँ पर बैठे तुम 
खुद को खोया सा पाओगे 
महसूस करोगे सांसो को 
धड़कन भी बुन पाओगे 
जब भूले शाम शहर की अपने 
खुद का होना पाओगे 
"तब फैली इस ख़ामोशी में तुम 
कितना कुछ सुन पाओगे"  

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