एक रोज़ कभी जब निलों पे
सूरज डूब रहा होगा
जब पंछी कोई घर को अपने
उड़ कर लौट रहा होगा
जब साख सभी पेड़ो के थक कर
सूरज डूब रहा होगा
जब पंछी कोई घर को अपने
उड़ कर लौट रहा होगा
जब साख सभी पेड़ो के थक कर
सुस्ताकर के झूलेंगे
जब सांझ तले पर्वत के तट पर
झरने कुछ कुछ बोलेंगे
जब सांझ तले पर्वत के तट पर
झरने कुछ कुछ बोलेंगे
जब दिन भर की हलचल के आगे
ख़ामोशी एक उभरेगी
जब जलते दिन के आंचल में
कुछ शामें आंखे खोलेंगी
तब ठीक वहीँ पर बैठे तुम
खुद को खोया सा पाओगे
महसूस करोगे सांसो को
धड़कन भी बुन पाओगे
जब भूले शाम शहर की अपने
खुद का होना पाओगे
"तब फैली इस ख़ामोशी में तुम
कितना कुछ सुन पाओगे"

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