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Friday, 17 March 2017

जब चली जाओगी तुम ऑफिस से



कैसा लगेगा जब तुम चली जाओगी
उस कोने से
जहाँ से तुम दिखाई भी नहीं देती
पर सुनाई देती हो ,
और जब भी कुछ कहती हो,
या लिखती हो तो
गूंज जाती हो ऑफिस के हर एक कोने तक
उसी कोने पर बैठे बैठे
जहाँ से तुम दिखाई भी नहीं देती

कैसा लगेगा जब चली जाओगी तुम
और नहीं रहोगी उस सफर में
जो सीढ़ियों से होकर के
ख़त्म होती है टपरी पे जाकर
और की जिसमे हसीं तुम्हारी
भर देती है चहक
सीढियो को संभाले दीवारों में

कैसा लगेगा जब तुम चली जाओगी
और फ़ोन आ जायेगा किसी का
फिर वो पूछेगा तुम्हारे बारे में
और खोजेगा तुम्हारी आवाज़
जो फ़ोन के सिरहाने आकर
बड़े प्यार से बेबी कहा करती है

तब अक्सर सोचता हूँ
की जब चली जाओगी तुम
तो शायद
कुछ शरारतें कम हो जाएंगी
किस्सों के सिलसिले रुक जायेंगे
कीबोर्ड की आवाज़ें थम जाएँगी
कुछ हसीं कुछ ठहाके कम होंगे
और नज़ाकत की कमी बन जायेगी

और कुछ यूँ होगा की होता है जैसे
जब चलें जातें है छोटे बच्चे घर से
बहुत देर तलक सुना सा रहता है आंगन
तुम चली जाओगी जब
तो कुछ देर तलक हम सबको ऐसा ही लगेगा शायद ||

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