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Tuesday, 17 November 2015

करवटें लिखीं हुई हैं



"चलो वक़्त की गिरहें खोल कर
दोहराते हैं सारे वाकिये फिर से
और ख़त्म करतें हैं सब कुछ
हसरतों की फेहरिस्त से 
तुमने सुना है ना 
यादें मिटती नही हैं 

आकर देख लो 
चादर की सिलवटों पर 
अब भी हमारी करवटें लिखीं हुई हैं "

Sunday, 11 October 2015

"मुतवाज़ी लकीरें"



"मुतवाज़ी लकीरें हैं हम दोनों
साथ चलेंगे पर कभी मिलेंगे नहीं
तो चलो बेफिक्र होकर
राहें पकड़ते हैं अपनी अपनी
और छोड़ देते हैं खुद को वक़्त की तर्ज़ पे
इल्म कहता है
ये लकीरें अनंत पर ही मिलती हैं"

‪#‎मुतवाज़ी‬ = समानांतर,Parallel

Friday, 25 September 2015

अब आईना भी देखूँ तो कोई और नज़र आता है



"वक़्त ने लिख रखें हैं  मेरे चेहरे पर कई हिसाब
अब आईना भी देखूँ तो कोई और नज़र आता है"

वो "शख्श"





ज़रा सुनो 
एक बात बताओ 
कहीं देखा है क्या तुमने, 
कभी मिले हो उससे 
उस "शख़्श" से 
जो पहले हुआ करता था "मै" 
एक अरसा बीत गया है   
उसे देखे हुए
    
अक्सर परेशान सा रहता था
मुझसे और मेरे ख्यालों से
उसे अस्ल ही रहना था 
आखिरी नब्ज़ तक   
जिद मेरी की बदलना है उसे 
ज़माने के जज़्ब में 
  
इसी कशमकश में 
वो "शख्श" चला गया इस नए "मै" को छोड़ कर
ले गया सारी शरारते और बेपरवाही 
और छोड़ गया मेरे हिस्से 
समझदारी का इल्म 

पर जब कभी देखता हूँ
एक कागज़ की कश्ती
किसी बच्चे के हाथो में
तो समझदारी फ़िज़ूल लगती है
शरारते याद आती है  
और याद आता है वो  "शख्श"
जो पहले हुआ करता था "मै"






Tuesday, 15 September 2015

बाल विवाह




यहाँ से दो छत दूर वाले घर पे ही रहती है
दो साल पहले आई थी
चौदह बरस की उम्र ले कर
ब्याह कर लाया था मुनीम का बेटा पास वाले गाँव से
दस बरस का फ़ासला था दोनों की उम्र में

वो आज कई दिनों बाद दिखी
अपने दो बच्चों के साथ
अब्तर मन से खेल रही थी उनसे
खुद को ढूँढ रही थी शायद
जो चौदह की उम्र में गुम हो गई थी
जवाब खोज रही थी, की बचपन जिए बिना
कोई कैसे किसी को बचपन का इल्म देगा    
और इन्ही फिरकों में अक्सर भूल जाती है
की वो अब एक माँ है ॥

पर ये कितना वाज़िब है
किसी का बचपन छीन कर
उसे किसी और का बचपन सौंप दिया जाये ॥




Monday, 13 July 2015

अब मुझको फिर से इंसान किया जाये




ज़माने से मुझको अनजान किया जाये
अब मुझको फिर से इंसान किया जाये

मशीनों की तरह जी कर थक चूका हूँ
ज़िन्दगी को पहले सा आसान किया जाये

अब की इस दुनिया में समझादरी बहुत है
मुझको फिर से उतना ही नादान किया जाये

वो मुझको जिन्दा देखेगा तो बहुत रोयेगा
फिर से मेरे मर जाने का ऐलान किया जाये

मेरे इश्क का दुनिया में ज़िक्र बहुत है
कोई खरीद न पाए ऐसा दाम किया जाये

गुजर जाता है वक़्त पन्नों के हिसाब में
एक शाम आज यारो के नाम किया जाये

कई हसरते दबा रखी है इस दिल की तिजोरी ने    
इसे लूट कर के दिल से सरे आम किया जाये

जो बुझी हुई आँखों में एक हँसी दे दे
नेकी का ऐसा कोई काम किया जाये

आबो-ओहोदों की उड़ाने अब हम बहुत भर चुके
इस खास शख्स को फिर से आम किया जाये

और क्या मिला शराफ़त की ज़िन्दगी जीकर “बांधे”
चलो आज खुद को थोडा बदनाम किया जाये

Saturday, 30 May 2015

  "तेरे होने की कविता"




सावंले रंग में ढली हुई रौशनी
शरारतों से भरी हुई एक थैली
मुस्कुराहटों का एक अबद कारवां
और बचपन के हसीन अफसाने

एब के चाँद का एक छोटा सा टुकड़ा 
नसीहतों की एक लंबी फेहरिस्त 
नज़ाकतो की बेसुमार नुमाइश
और हवाओ का एक शांत लहज़ा 

गुस्से के सुरज की किरण
जवानी का संभला हुआ रुख
इल्म का बेबाक जुमला 
और खत्म न होने वाली बातों की किताब

कितना कुछ शामिल है तेरे होने मे 

ये सब मुक्कमल है खुद मे 
और उसपे बस एक तुम

बात एक ही है 
ये पूरी कविता कह दु 
या सिर्फ तेरा नाम !!



"एक इत्तेफाक ये भी है 

की हर एक नज़्म रो रही है

तुम जाने वाली हो

मेरी कविता खत्म हो रही है "

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