एक बात बताओ
कहीं देखा है क्या तुमने,
कभी मिले हो उससे
उस "शख़्श" से
जो पहले हुआ करता था "मै"
एक अरसा बीत गया है
उसे देखे हुए
अक्सर परेशान सा रहता था
मुझसे और मेरे ख्यालों से
उसे अस्ल ही रहना था
आखिरी नब्ज़ तक
जिद मेरी की बदलना है उसे
ज़माने के जज़्ब में
इसी कशमकश में
वो "शख्श" चला गया इस नए "मै" को छोड़ कर
ले गया सारी शरारते और बेपरवाही
और छोड़ गया मेरे हिस्से
समझदारी का इल्म
पर जब कभी देखता हूँ
एक कागज़ की कश्ती
किसी बच्चे के हाथो में
तो समझदारी फ़िज़ूल लगती है
शरारते याद आती है
और याद आता है वो "शख्श"
जो पहले हुआ करता था "मै"

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