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Friday, 25 September 2015

अब आईना भी देखूँ तो कोई और नज़र आता है



"वक़्त ने लिख रखें हैं  मेरे चेहरे पर कई हिसाब
अब आईना भी देखूँ तो कोई और नज़र आता है"

वो "शख्श"





ज़रा सुनो 
एक बात बताओ 
कहीं देखा है क्या तुमने, 
कभी मिले हो उससे 
उस "शख़्श" से 
जो पहले हुआ करता था "मै" 
एक अरसा बीत गया है   
उसे देखे हुए
    
अक्सर परेशान सा रहता था
मुझसे और मेरे ख्यालों से
उसे अस्ल ही रहना था 
आखिरी नब्ज़ तक   
जिद मेरी की बदलना है उसे 
ज़माने के जज़्ब में 
  
इसी कशमकश में 
वो "शख्श" चला गया इस नए "मै" को छोड़ कर
ले गया सारी शरारते और बेपरवाही 
और छोड़ गया मेरे हिस्से 
समझदारी का इल्म 

पर जब कभी देखता हूँ
एक कागज़ की कश्ती
किसी बच्चे के हाथो में
तो समझदारी फ़िज़ूल लगती है
शरारते याद आती है  
और याद आता है वो  "शख्श"
जो पहले हुआ करता था "मै"






Tuesday, 15 September 2015

बाल विवाह




यहाँ से दो छत दूर वाले घर पे ही रहती है
दो साल पहले आई थी
चौदह बरस की उम्र ले कर
ब्याह कर लाया था मुनीम का बेटा पास वाले गाँव से
दस बरस का फ़ासला था दोनों की उम्र में

वो आज कई दिनों बाद दिखी
अपने दो बच्चों के साथ
अब्तर मन से खेल रही थी उनसे
खुद को ढूँढ रही थी शायद
जो चौदह की उम्र में गुम हो गई थी
जवाब खोज रही थी, की बचपन जिए बिना
कोई कैसे किसी को बचपन का इल्म देगा    
और इन्ही फिरकों में अक्सर भूल जाती है
की वो अब एक माँ है ॥

पर ये कितना वाज़िब है
किसी का बचपन छीन कर
उसे किसी और का बचपन सौंप दिया जाये ॥




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