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Sunday, 19 October 2014

बात एक ही है





सावन से या तेरी आँखों से
हो वो बरसात एक ही है

वक्त की ख़ामोशी और तेरा चुप रहना
कहने को वो रात एक ही है

झरनों का शोर और तेरा चहकना
सुन लो तो साज़ एक ही है

अब हवाएं चले ,या तेरी जुल्फें उड़े
नजारों का साथ एक ही है

ये गहरा समंदर, तेरी नीली आंखे
डुबो तो बात एक ही है

चाँद हो या फिर तेरी हसीं हो  
देखो तो बात एक ही है

ये आसमां और तेरी खुली बाहें
सिमटो तो अहसास एक ही है

अब सांसे मिले या तेरा साथ मिले
मेरे जीने की बात एक ही है

Thursday, 31 July 2014



"इज़्ज़त लहज़े में होती है अल्फाज़ो में नहीं "

"RESPECT LIES IN TONE NOT IN WORDS"

Sunday, 29 June 2014



"No matter…how much special thing you may have, finally it's habit will make it quotidian for you"


"चाहे आपके पास कितनी भी अदभुत चीज़ हो ,उसकी आदत उसे आपके लिए साधारण बना ही देती है"

Saturday, 19 April 2014



कुछ रुखी रुखी ,फीकी सी ,कब दुनिया पूरी लगती है , 
पल भर बातें ना हो तुझसे ,तो शाम अधूरी लगती है

Thursday, 10 April 2014



एक ज़रा सी बात पर , क्यों उम्मीदों को तोड़ दिया जाए 
ये ज़रूरी तो नही कि जो मिल ना सके उसे छोड़ दिया जाए

Monday, 7 April 2014

Wo rista jo me samajh nahi paya.....(to be continued)



"कभी रातें गुज़र जाती है हसीन बातों में,कभी ख्वाब कोई एक नया पलता है 
जो तेरे संग हो जाऊ मै भूले से कही, इस बहते वक़्त का पता कहाँ चलता है"

Sunday, 30 March 2014

मेरे लफ्जों के दायरे बढ़ गए हैं








लफ्ज़ गूंजते थे पहले , इन चार दीवारो के कमरे में
तो कभी स्याह बनकर कलम में ही सुख  जाते  थे  
कई दफा ज़ेहन से निकले तो थे ,हलक़ पे आ रुके  
तो कभी मेज़ पे बिखरे कागज़ो पर सिमट जाते थे

लफ्ज़ दफ़न हो जाते थे पहले यादों के बोझ तले
कभी बन के आंसू इन आँखों से निकल जाते थे
जब क़ुदरत के आशियाने में भी सूकून न मिला
तो बन के पत्थर किसी तालाब में फेके जाते थे

अब सुना है कि वो लफ्ज़ कई कानों से होकर के गुजरे है
मिल जाते हैं मुझे इस शहर की सकरी तंग गलियों में
मेरे नज़्म दिख जाते है मुझे कई हिलते हुए होठों पर
उन चंद दीवारो से बाहर ,किसी बग़ीचे की शोख़ कलियों में

एक ख़ामोशी जो गूंजती थी ,मेरे नब्ज़ की गहराईयों में
तेरी  बातों  से उसके हिस्से भी, अब सारे बिखर गए है

तू देख मेरे चेहरे पर आब-ए -ख्व़ाब चढ़ गए हैं
कि तेरे आ जाने से,मेरे लफ्जों  के दायरे बढ़ गए हैं


Tuesday, 18 March 2014



लाज़मी था पहलों का सिलसिला बिगड़ना
मैंने उठते ही एक रोते हुए चेहरे को देखा था

Sunday, 23 February 2014



कभी असमानों से ऊँची,कभी हाशिये पे  झुकी लगती है 
ज़िन्दगी तू चलती है , तो फिर क्यों रुकी रुकी लगती है

Monday, 10 February 2014

"फिर से उस किनारे पर उसने पैर उतारा होगा"








वो दूर जाकर के मुझसे ,आज खुश बहुत था
सोच कि जुदा होने का ऐसा भी नज़ारा होगा

हर तरफ आज उसकी जीत का जश्न है
कोई शख्स आज फिर कहीं पे हारा होगा

तू पूछता है खुद से तेरी ज़िन्दगी का मकसद
किसी शख्स के लिए एक तू ही सहारा होगा 

वो आज भी बहुत गम में था हमेशा की तरह
फिर किसी की बुझी आँखों को सवांरा होगा

उसकी आँखे बंद देखकर वो आज बहुत रोया है
 बेशक ही वो उसका कोई बहुत प्यारा होगा

मेरे कानों में ना जाने ये आहट कैसी है
कही दूर किसी ने मुझको पुकारा होगा

"इस  तालाब के पानी में आज फिर हलचल हुई है
फिर से उस किनारे पर उसने पैर उतारा  होगा "

















Sunday, 9 February 2014



"इस तालाब के पानी में आज फिर हलचल हुई है
फिर से उस किनारे पर उसने पैर उतारा होगा"

Sunday, 19 January 2014



"नफरत और खौफ की दुनिया में ,ओहदे पर खून बहाते है
क्या जात-पात और क्या मज़हब ,ईमान सभी ढल जाते है 

आँखों में जो डर दिखता है , मज़बूर उसे कर जाता है
हालात बदलते हैं फिर तो , इंसान भी बदल जाते है " ...

Sunday, 12 January 2014



मैं नादान हुँ बहुत ,कोई बात मुझे क्या पता होगी 

जो रूठे हो आज मुझसे ,तो फिर मेरी ही खता होगी  



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