लफ्ज़ गूंजते थे पहले , इन चार दीवारो के कमरे में
तो कभी स्याह बनकर कलम में ही सुख जाते थे
कई दफा ज़ेहन से निकले तो थे ,हलक़ पे आ रुके
तो कभी मेज़ पे बिखरे कागज़ो पर सिमट जाते थे
लफ्ज़ दफ़न हो जाते थे पहले यादों के बोझ तले
कभी बन के आंसू इन आँखों से निकल जाते थे
जब क़ुदरत के आशियाने में भी सूकून न मिला
तो बन के पत्थर किसी तालाब में फेके जाते थे
अब सुना है कि वो लफ्ज़ कई कानों से होकर के गुजरे है
मिल जाते हैं मुझे इस शहर की सकरी तंग गलियों में
मेरे नज़्म दिख जाते है मुझे कई हिलते हुए होठों पर
उन चंद दीवारो से बाहर ,किसी बग़ीचे की शोख़ कलियों में
एक ख़ामोशी जो गूंजती थी ,मेरे नब्ज़ की गहराईयों में
तेरी बातों से उसके हिस्से भी, अब सारे बिखर गए है
तू देख मेरे चेहरे पर आब-ए -ख्व़ाब चढ़ गए हैं
कि तेरे आ जाने से,मेरे लफ्जों के दायरे बढ़ गए हैं

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