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Sunday, 23 February 2014



कभी असमानों से ऊँची,कभी हाशिये पे  झुकी लगती है 
ज़िन्दगी तू चलती है , तो फिर क्यों रुकी रुकी लगती है

Monday, 10 February 2014

"फिर से उस किनारे पर उसने पैर उतारा होगा"








वो दूर जाकर के मुझसे ,आज खुश बहुत था
सोच कि जुदा होने का ऐसा भी नज़ारा होगा

हर तरफ आज उसकी जीत का जश्न है
कोई शख्स आज फिर कहीं पे हारा होगा

तू पूछता है खुद से तेरी ज़िन्दगी का मकसद
किसी शख्स के लिए एक तू ही सहारा होगा 

वो आज भी बहुत गम में था हमेशा की तरह
फिर किसी की बुझी आँखों को सवांरा होगा

उसकी आँखे बंद देखकर वो आज बहुत रोया है
 बेशक ही वो उसका कोई बहुत प्यारा होगा

मेरे कानों में ना जाने ये आहट कैसी है
कही दूर किसी ने मुझको पुकारा होगा

"इस  तालाब के पानी में आज फिर हलचल हुई है
फिर से उस किनारे पर उसने पैर उतारा  होगा "

















Sunday, 9 February 2014



"इस तालाब के पानी में आज फिर हलचल हुई है
फिर से उस किनारे पर उसने पैर उतारा होगा"

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