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Monday, 30 September 2013

चलो ना कुछ देर और बात करते हैं



हर शब मन मे एक अरमां सा जगता है
रोज़ मिलकर भी कुछ अधुरा सा लगता है 
रोज़ ही बातो में कई दफ़ा लड़ते हैं
चलो ना कुछ देर और बात करते हैं

साथ ही चलते है ,साथ ही फिरते हैं
साथ गिरकर भी हर बार संभलते हैं
रोज़ ही किसी  नये ख्वाब में पलते हैं
चलो न कुछ देर और बात करते हैं  

कहते हैं बातों को ,बातों में हँसते है  
खामोश रहकर  भी सब कह लेते हैं
रोज़ ही ये किस्से कहाँ से निकलते हैं
चलो ना कुछ देर और बात करते हैं

मिलना जो होता है ,तो दूर भी रहते है
जाते हुए भी देखो ना  कितना लड़ते हैं
मन नहीं होता  फिर भी बिछड़ते हैं
चलो ना कुछ देर और बात करते हैं





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