अब तुम ही बता दो
लोग पूछते है अक्सर
नज़्म रूठी रूठी सी क्यों है
अब सुबह को रौशनी नही होती नज़्म में
न शब की ठंडी हवाएं चलती हैं
गुलज़ार का ज़िक्र नहीं होता है
बारिश में आवाज़ नही आती
थपथपाते पैरों की
और न चादरों की सिलवटें होतीं है
अब अल्फाज़ कुछ कहते नहीं हैं
कोरे कागज़ के पन्नो से
जुबां की तरह
कलम खामोश रहती हैं अक्सर
थक चूका हूँ मैं
लोग पूछते हैं बार बार
अब तुम ही बता दो
"की सब इत्तेफाक ही है
हर एक नज़्म रो रही है
तुम जाने वाली हो
मेरी कविता खत्म हो रही है "