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Saturday, 13 February 2016

मेरी कविता खत्म हो रही है



अब तुम ही बता दो 
लोग पूछते है अक्सर
नज़्म रूठी रूठी सी क्यों है
अब सुबह को रौशनी नही होती नज़्म में 
न शब की ठंडी हवाएं चलती हैं 
गुलज़ार का ज़िक्र नहीं होता है 
बारिश में आवाज़ नही आती 
थपथपाते पैरों की
और न चादरों की सिलवटें होतीं है 
अब अल्फाज़ कुछ कहते नहीं हैं 
कोरे कागज़ के पन्नो से 
जुबां की तरह 
कलम खामोश रहती हैं अक्सर
थक चूका हूँ मैं
लोग पूछते हैं बार बार   
अब तुम ही बता दो  
"की सब इत्तेफाक ही है  
हर एक नज़्म रो रही है
तुम जाने वाली हो
मेरी कविता खत्म हो रही है "

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