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Wednesday, 27 March 2013

फ़ुर्सत के लम्हो मे










 फ़ुर्सत के लम्हो मे,कभी हो आता हूँ  उस वीरान से कमरे से,
जहाँ बिखरे हुए है,मेरे बचपन के कई साथी,
कुछ टूटे हुए खिलोने,जो लगता है  की मुझे बुला रहे है ,
वो गली अब चहकहना भूल गई है ,जहाँ  खेल खेल मे काँच टूटा करते थे,
जहा दीवारो पे अब भी.स्टंप के निशान बने हुए है ,
वो नदी पहाड़ के खेल मे हम जो बना आए थे,
वो नदी पहाड़ अब सुने पड़  गये हे,
वो हमारी  छुपने की जगह...अब सच मे छुप  गई है  दुनिया से,
उस मैदान मे अब भी वो खपरेल  शिद्दत  से फैले हुए है ,
जो आख़िरी खेल मे किसी ने गिरा दिए थे  पित्ठुल से,
अब गलिया तरस गई है बच्चों  के लिए...
जिनकी हसीं अक्सर वहाँ  पर गूंजा करती थी...

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